मसला माफी का नहीं, माफी की स्टाइल का है। बात नब्बे के दशक के उत्तरार्ध की है जब महाराष्ट्र में शिवसेना-बीजेपी की सरकार थी। मुख्यमंत्री शिवसेना का ही था। उसी दौरान मराठी के अग्रणी लेखक, साहित्यकार व कलाकार पु. ल. देशपांडे को महाराष्ट्र भूषण सम्मान दिया गया था। उसी दौरान राज्य सरकार के किसी फैसले की देशपांडे ने कड़ी आलोचना कर दी। शिवसेना प्रमुख बाला साहेब ठाकरे से यह आलोचना बर्दाश्त नहीं हुई। उन्होंने कहा, ‘कितनी अजीब बात है कि लोग हमीं से सम्मान-पुरस्कार लेते हैं और फिर हमारी ही आलोचना करते हैं।‘
महाराष्ट्र में लोगों की जो विकसित बौद्धिक चेतना रही है, उसमें स्वाभाविक ही ठाकरे के उस बयान की तीखी प्रतिक्रिया हुई। लोग सवाल करने लगे कि सरकार अगर किसी साहित्यकार का सम्मान करती है तो क्या वह उसे खरीद लेती है? आखिर ठाकरे ऐसी बात कर कैसे सकते हैं? सरकार पर और खासकर बाला साहेब ठाकरे पर इस बयान के लिए पु. ल. से माफी मांगने का दबाव बढ़ने लगा।
आखिर बाला साहेब सामने आए और पु. ल. को जैसे माफी देते हुए फरमाया, ‘वह महान साहित्यकार हैं। उनसे कोई कुछ न कहो, उन्हें छोड़ दो।‘ हालांकि इसके कुछ समय बाद ठाकरे ने खुद पुणे जाकर पु. ल. से मुलाकात की और कहते हैं कि माफी भी मांगी। लेकिन माफी मांगने की पहली अदा भी इतिहास में दर्ज हो ही गई।
सवाल उठता है, आखिर वह क्या चीज है जो किसी सत्ताधीश को माफी मांगने की सूरत में भी माफ करने की मुद्रा में ला देती है। कॉमन सेंस तो बड़ी आसानी से इसे बेवकूफी बताकर खारिज कर सकता है। लेकिन यही कथित बेवकूफी बकौल राहुल गांधी, किसी इडियट को अपनी सबसे बड़ी विशेषता लगती है। क्योंकि इससे उसकी छवि का सवाल जुड़ा है। कोई और समझे या न समझे तानाशाह अपनी यह असलियत अच्छी तरह समझ रहा होता है कि उसकी सारी ताकत उस छवि पर टिकी है जो उसके समर्थकों के मन में बनी हुई है।
जाहिर है, जेन ज़ी को मिली ताजा माफी से भी किसी को हैरान नहीं होना चाहिए। जरा सोचिए मगरमच्छ पकड़ने, चाय बेचने, भीख मांगने, तपस्या करने और न जाने क्या क्या गुल खिलाने के बाद जो छवि नसीब हुई है, उसे जेन ज़ी के बच्चों के हाथों बर्बाद होते कैसे देख सकते हैं। लेकिन सवाल यह है कि न देखें तो क्या करें।
एक आसान उपाय यह था कि सच्चे हृदय से माफी मांग कर हिसाब-किताब साफ कर लिया जाता और शिक्षा व्यवस्था के सुधार का काम नए सिरे से शुरू करते हुए बच्चों का विश्वास जीता जाता। लेकिन छवि का सवाल आड़े आ रहा था। सो फैसला किया गया कि बच्चों से माफी मांगने के बजाय उन्हें माफ कर दिया जाए।
और लीजिए साहब, बिन मांगे ही जेन ज़ी को माफी मिल गई। लेकिन वह बेपरवाह है। उसने तो जैसे प्रदर्शन करना था कर लिया, जो नारे लगाने थे लगा लिए, जैसे मीम बनाने थे, बना लिए। ठीक है कि इस चक्कर में सरकार की पुलिस और बीजेपी के गुंडों ने मिलकर उसे खूब तोड़ा, लेकिन वह पहले ही कह चुकी थी कि ‘तुम हमारे हाथ-पैर ही तो तोड़ोगे, हमारे मनोबल का क्या करोगे?’
अपने टूटे हाथ-पैरों से ही इस पीढ़ी ने सत्ता का मनोबल इस कदर ध्वस्त कर दिया कि दोषी न समझने के बावजूद वह अपने शिक्षामंत्री को पैदल करने पर राजी हो गई।
रही बात पुलिस बर्बरता की तो उसके लिए किसी माफी की दरकार नहीं है। वह मौजूदा सरकार पर बकाया इस पीढ़ी का कर्ज है। उसका हिसाब यह पीढ़ी सत्ता से कब, कैसे और किस रूप में लेगी, इसका अभी सिर्फ अनुमान ही लगाया जा सकता है।
(कार्टून साभार : कार्टूनिस्ट आलोक के फेसबुक पेज से)
(प्रणव प्रियदर्शी ‘जनसत्ता’, ‘लोकमत समाचार’ और ‘नवभारत टाइम्स’ में लंबी पत्रकारीय पारी के बाद फ़िलहाल स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं।)